जालोर. मानव जन्म लेते हुए भी रोता है, जीवन जीते हुए भी दु :खों के कारण रोता है और प्रायः करके रोते-रोते ही मरता है। परंतु लोकोत्तर पुरुष तीर्थकर परमात्मा की आखों में कभी ऑंसू नहीं आते है। उनको जन्म मध्य रात्रि में होता है फिर भी चारों दिशा में प्रकाश हो जाता है। सातों नरकों में प्रकाश हो जाता है। जगत् में रहे सभी जीवों को सुख की प्राप्ति होती है। जन्म के समय वे स्वयं हंसते है और जगत् को भी हंसाते है।. 

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आचार्य रत्नसेन सुरिश्वर महाराज ने सोमवार को श्री चार थुई जैन धर्मशाला में आयोजित प्रवचन के दौरान यह बात कही। उन्होंने कहा कि परमात्मा का जन्म जगत के कल्याण के लिए होता है। परमात्मा सर्वजीवों का कल्याण चाहते हैं। उनके जन्म के समय नारकीय जीवों को भी क्षण मात्र के लिए सुख की प्राप्ति होती है। संपूर्ण जगत में एक आभामंडल छा जाता है।

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परमात्मा के जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होती है। न पारिवारिक समस्या, न शारीरिक समस्या एवं न राजकीय समस्या तीर्थकर के जीवन में होती है। दीक्षा के बाद प्रायः तीर्थकरों को उपसर्ग नहीं होते ।मात्र पार्श्वनाथ भगवान और महावीर स्वामी के छद्मस्थ काल में उपसर्ग हुए थे। पार्श्वनाथ भगवान के ऊपर मात्र कमठ के द्वारा हुए एक उपसर्ग की बात आती है। परंतु भगवान महावीर के दीक्षा स्वीकार के बाद उपसर्ग की हारमाला चली है। इन सभी उपसर्गों में वे कभी विचलित नहीं हुए। परंतु एक रात्रि में मरणांत 20 उपसर्ग एवं छह महीने तक भिक्षा प्राप्ति में विघ्न करने वाले संगम देव के वापस लौटने पर उसकी आत्मा पर करणा भाव के कारण भगवान महावीर की आंखों में भी ऑंसू आ गए थे। ये करुणा के ऑंसू प्रशंसनीय है परंतु हमारे दुःख के ऑंसू प्रशंसनीय नहीं है । . 

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गौरतलब है कि मूल रूप से बाली में जन्मे आचार्य रत्नसेन सुरेश्वर महाराज के संयम जीवन के सुवर्ण वर्ष में प्रवेश करने की निमित्त विशेष गुरूदेव का अक्षत वधावाना कार्यक्रम का आयोजन हुआ। कार्यक्रम का संगीतमय संचालन तेज सिंह राठौड़ ने किया।