कालूराम प्रजापत, भाद्राजून (जालोर). दीपोत्सव का पर्व परवान पर है। दीपावली के अवसर पर जहां शहरों में आधुनिक सजावट, बिजली की रंग-बिरंगी रोशनी और आर्टिफिशियल रंगोलियों का आकर्षण देखने को मिलता है, वहीं ग्रामीण अंचलों में आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ दीपावली मनाने की परंपरा जीवंत है। गांवों में मिट्टी की खुशबू, गोबर से लिपे आंगन, पारंपरिक रंगोलियां और मिट्टी के दीपकों की रोशनी दीपोत्सव की खुशियों को और भी खास बना देती है।
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ग्रामीण संस्कृति में दीपावली केवल दीप जलाने और मिठाइयां बांटने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह आपसी प्रेम, भाईचारे, लोक परंपराओं और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक भी है। गांवों में दीपावली की तैयारियां कई दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं। गांवों में घर का कुछ कच्चा होता हैं, वहां महिलाएं शुद्ध गोबर से आंगन की लिपाई करती हैं। साफ-सुथरे आंगन में पारंपरिक तरीके से रंगोलियां बनाई जाती हैं। रंग-बिरंगे रंगों और आकर्षक आकृतियों से सजे आंगन घर की सुंदरता बढ़ाने के साथ ही आने वाले मेहमानों का स्वागत भी करते हैं।
घर-घर दीपक पहुंचाते हैं कुम्हार परिवार
ग्रामीण क्षेत्रों में दीपावली के अवसर पर कुम्हार परिवारों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इनके द्वारा मिट्टी से तैयार किए गए दीपक घर-घर पहुंचा कर मंगल कामना की जाती है। प्रत्येक परिवार अपनी आवश्यकता और परंपरा के अनुसार दीपक ग्रहण करता है। इस दौरान दीपक पहुंचाने वाले को अनाज, कपड़े और रुपए-पैसे देकर सम्मानित किया जाता है।
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यह परंपरा केवल दीपक लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज में परस्पर सहयोग और पारंपरिक व्यवसायों के प्रति सम्मान का भी संदेश देती है।
पशुओं के सींगों को रंगकर मनाते हैं खुशियों का पर्व
ग्रामीण संस्कृति में पशुधन को परिवार का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। इसी कारण दीपावली के अवसर पर पशुओं का भी विशेष शृंगार किया जाता है। पशुओं के सींगों को विभिन्न रंगों से सजाया जाता है। ग्रामीण मान्यता के अनुसार दीपोत्सव की खुशियों में पशुधन को भी सहभागी बनाया जाता है। पशुओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने की यह अनूठी परंपरा है।
गोवर्धन पूजा पर घरों के बाहर सजते हैं गोवर्धन महाराज
दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व रहता है। इस दिन अलसुबह ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर के बाहर गोबर से गोवर्धन महाराज की आकृतियां बनाई जाती हैं।
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इनका आकर्षक शृंगार कर पूजा-अर्चना की जाती है। ग्रामीण परिवार पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार गोवर्धन महाराज को कादरी,बेरोजगार फल भेंट अर्पित करते हैं। इस अवसर पर बैल एवं अन्य पशुधन से जुड़ी लोक परंपराओं का भी निर्वहन किया जाता है।
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गोवर्धन पूजा के दौरान घरों के बाहर दीपक जलाए जाते हैं तथा परिवार के सदस्य एकत्रित होकर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। शाम को दीप प्रज्वलित कर आतिशबाजी के साथ दीपोत्सव की खुशियों का इजहार किया जाता है।
आधुनिकता के बीच संस्कृति की पहचान बनी हैं ग्रामीण परंपराएं
बदलते समय के साथ दीपावली मनाने के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है। बाजारों में सजावटी सामान, बिजली की झालरों और आधुनिक रंगोलियों की भरमार है, लेकिन ग्रामीण अंचलों में आज भी मिट्टी के दीपक, गोबर से लिपे आंगन, पारंपरिक रंगोलियां और गोवर्धन पूजा जैसी परंपराएं अपनी पहचान बनाए हुए हैं।
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भाद्राजून सहित आसपास के गांवों में दीपावली का पर्व आज भी लोक संस्कृति, पारिवारिक एकता और सामाजिक सद्भाव के साथ मनाया जाता है। इन परंपराओं में गांव की मिट्टी की खुशबू, बुजुर्गों के संस्कार और आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का संदेश छिपा हुआ है।
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कुल मिलाकर, ग्रामीण अंचलों की यह पारंपरिक दीपावली बताती है कि त्योहारों की असली खुशियां केवल आधुनिक सजावट में नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति, परंपराओं और अपनों के साथ मिलकर खुशियां बांटने में बसती हैं।