भले ही आधुनिक पंचांग और काल-गणना के गणितज्ञ कार्तिक की इस अमावस्या को खगोलीय अंधकार की चरम सीमा कहें, पर अंतस का मानस इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। मन पूछता है कि आखिर यह अंधकार है क्या? क्या यह प्रकाश का अभाव मात्र है या स्वयं में कोई स्वतंत्र सत्ता है? भारतीय मनीषा ने कभी अंधकार को निरपेक्ष सत्य नहीं माना, उसने इसे हमेशा एक चुनौती के रूप में देखा है— एक ऐसी ललकार, जो मनुष्य के भीतर छिपी रचनात्मक ऊर्जा को उद्वेलित करती है। वर्षा की गंदली आर्द्रता जब विदा हो जाती है और शरद का निर्मल आकाश अपनी नीलिमा बिखेरने लगता है, तब चराचर जगत में एक अजीब सी शांति छा जाती है। इसी शांति के गर्भ से दीपावली का उत्सव अंकुरित होता है। यह उत्सव किसी एक दिन का कौतुक नहीं है, यह तो मनुष्य की उस आदिम जिजीविषा का वृहद वृतांत है जो हजारों वर्षों की सांस्कृतिक यात्रा के बाद भी उतनी ही नवीन और ऊर्जस्वित है, जितनी सभ्यता के पहले भोर में रही होगी।

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जब मैं इस पर्व के लोक-पक्ष को निहारता हूं, तो मुझे इसमें उपनिषदों के ऋषियों की गंभीर वाणी और ग्राम-वधू के अंचल की आत्मीयता का एक अनूठा संगम दिखाई देता है। हाट-बाजारों में कुम्हार के चाक पर घूमता हुआ गीली मिट्टी का वह लोंदा जब एक लघु घट का रूप लेता है, तो वह केवल एक पात्र नहीं होता। वह तो मनुष्य के श्रम और संकल्प का साक्षात विग्रह है। अचरज होता है कि जो मिट्टी पैरों तले रौंदी जाती है, वही जब मनुष्य के कर-कमलों और अग्नि के ताप से गुज़रती है, तो अंधकार के महासागर को चुनौती देने वाली दीप-शिखा बन जाती है। इस मृण्मय दीप में जो स्नेह यानी तेल भरा जाता है, वह केवल एक भौतिक द्रव्य नहीं है, वह तो मानव-हृदय की करुणा और आत्मीयता का प्रतीक है। जब तक समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति के पसीने और श्रम को इस उत्सव में उचित आदर नहीं मिलता, तब तक बड़े-बड़े प्रासादों पर जगमगाती विद्युत-मालाएं केवल वैभव का दंभ भर सकती हैं, लोक-कल्याण का आलोक नहीं बिखेर सकतीं।

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बाहर का अंधकार उतना भयावह नहीं होता जितना भीतर का प्रमाद। दीपावली मूलतः इसी आंतरिक प्रमाद को बुहारने का अनुष्ठान है। त्योहार से हफ़्तों पहले घरों में जो लीपने-पोतने और स्वच्छता का उपक्रम चलता है, वह महज़ एक भौतिक क्रिया नहीं, बल्कि अतीत के कबाड़ और मन के अवसादों से मुक्ति का प्रयास है। जो रूढ़ हो चुका है, जो सड़ चुका है और जो जीवन की गति में बाधक है, उसका विसर्जन अनिवार्य है। लेकिन इस विसर्जन के साथ ही नूतन का स्वागत भी जुड़ा है। दीवारों पर चढ़ती सफ़ेदी की परत जीवन को एक नए, अनासक्त नजरिए से देखने की मानवीय चेष्टा है। यह देखना कितना सुखद है कि अभावों के बीच जीने वाला आम आदमी भी इस बेला में अपने टूटे-फूटे संसार को सुंदर बनाने की एक सात्विक होड़ में शामिल हो जाता है। इस लोक-हृदय की विशालता को समझे बिना हम भारतीय संस्कृति के मूल मर्म तक कभी नहीं पहुंच सकते।

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कबीर और नाथ सिद्धों ने जिस 'घट-भीतर दीपक' की बात कही थी, उसका लोक-रूप हमें इस पर्व में साक्षात दिखाई देता है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम जब चौदह वर्षों के वनवास और लंका के अहम का मर्दन करके साकेतपुरी लौटे, तो अयोध्या की प्रजा ने घृत के दीप जलाए थे। यह किसी राजा के लौटने की औपचारिक खुशी नहीं थी, बल्कि यह लोक-मानस द्वारा शील, करुणा और न्याय की पुनर्स्थापना का अभिनंदन था। जिसे हम 'रामराज्य' कहते हैं, वह कोई भौगोलिक साम्राज्य नहीं था, वह तो भय-मुक्ति और परस्पर विश्वास की एक मानसिक अवस्था थी। आज के इस संक्रमण काल में जब मनुष्य के भीतर स्वार्थ का रावण अधिक सघन और आक्रामक हो चला है, दीपावली का यह सांस्कृतिक आख्यान और भी प्रासंगिक हो जाता है। जब तक हम अपने अंतःकरण में छिपे मद, लोभ और ईर्ष्या का दहन नहीं करते, तब तक बाहर की कोई भी रोशनी हमारे जीवन के अंधेरे को दूर नहीं कर सकती।

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परंतु आज के यांत्रिक युग ने इस शांत और गंभीर पर्व को एक कोलाहलपूर्ण तमाशे में बदल दिया है। बारूद का यह आत्मघाती शोर और हवा को विषाक्त करता हुआ धुआं— क्या यही हमारी दीपोत्सव की चेतना है? हमारी सनातन परंपरा तो संपूर्ण ब्रह्मांड की शांति और कल्याण की कामना करती है। जो आनंद दूसरों के मन में भय पैदा करे, जो प्रकाश प्रकृति के फेफड़ों को भारी कर दे, वह उत्सव नहीं, बल्कि एक प्रकार की विकृति है। मिट्टी का दीया जब जलता है, तो वह निशब्द जलता है। उसकी लौ में एक मौन तपस्या होती है, जो बिना किसी ढोल-नगाड़े के अपने आस-पास के अंधकार को समेट लेती है। हमें इस पर्व को पुनः उसी नैसर्गिक और सात्विक रूप में लौटाना होगा, जहां दीपकों की मद्धम और स्निग्ध आभा में शरद की हवा अपनी पवित्रता बनाए रख सके और प्रकृति का कण-कण निर्भय होकर मुस्कुरा सके।

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वस्तुतः, दीपावली समय के ललाट पर अंकित एक ऐसा जाज्वल्यमान तिलक है जो हमें बार-बार हमारी मूल जड़ों की याद दिलाता है। यह पर्व हमें यह अटूट विश्वास देता है कि तमस चाहे कितना भी पुराना, जिद्दी और सर्वव्यापी क्यों न हो, सत्य की एक नन्हीं सी किरण भी उसका मस्तक झुकाने की सामर्थ्य रखती है। यदि हम सब मिलकर अपने-अपने कर्म-क्षेत्र और अंतस में एक-एक दीप प्रज्वलित कर सकें— विवेक का, सौहार्द का और सहिष्णुता का, तो यह पृथ्वी सचमुच रहने योग्य हो जाएगी। तब कार्तिक की यह अमावस्या काल का कोई काला धब्बा नहीं रह जाएगी, बल्कि वह एक ऐसे शाश्वत और ज्योतिर्मय प्रभात की पीठिका बन जाएगी जिसका सूर्य कभी अस्ताचल की ओर नहीं बढ़ता। यही दीपोत्सव का चिरंतन संदेश है और इसकी आदि-अनादि यात्रा है जो हर वर्ष हमारे द्वार पर आकर हमें जगा जाती है।