नकली डिग्री, असली जान का खतरा

Devendraraj Suthar
Devendraraj Suthar Verified Local Voice • 25 Aug, 2026 Editor
Oct 17, 2026 • 6:24 PM  0
Last Edited By: DDT Team (1 hour ago)
स
स्वास्थ्य
NEWS CARD
Logo
नकली डिग्री, असली जान का खतरा
“नकली डिग्री, असली जान का खतरा”
Favicon
Read more on www.ddthindi.com/s/fe9eb5
17 Oct 2026
https://www.ddthindi.com/s/fe9eb5
Copied
नकली डिग्री, असली जान का खतरा

राजस्थान में फर्जी डिग्रियों के सहारे डॉक्टर बनने के कथित खेल का खुलासा केवल दो गिरफ्तारियों की खबर नहीं है, यह उस व्यवस्था पर सवाल है जिस पर आम आदमी अपनी जान सौंपता है। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप की कार्रवाई में सीकर के पंकज यादव और जालोर के नानजीराम चौधरी पकड़े गए हैं। आरोप है कि एक ने MBBS की फर्जी डिग्री पर पंजीकरण कराया और दूसरे ने गायनेकोलॉजी डिप्लोमा के जाली कागज लगाए। जाँच में एक आरोपी के आठवीं पास होने की बात भी सामने आई है। यानी जिस हाथ को मरीज की नब्ज थामनी थी, उसके पास बुनियादी चिकित्सा शिक्षा तक नहीं थी। एसओजी के एडीजी विशाल बंसल के मुताबिक पंकज ने 2013 से 2018 के बीच कजाकिस्तान से पढ़ाई की थी। डिग्री असली हो या नकली, भारत में प्रैक्टिस के लिए रास्ता एक ही है और वह परीक्षा पास करने से होकर गुजरता है। जब उस रास्ते पर बार-बार असफलता मिली, तो आरोपी ने कथित तौर पर शॉर्टकट चुन लिया। यह शॉर्टकट सिर्फ कानून नहीं तोड़ता, लोगों की जिंदगी को जोखिम में डालता है।

विदेश से MBBS करके लौटने वाले छात्रों के लिए FMGE वह दीवार है जिसे पार करना हर किसी के बस की बात नहीं। राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के आँकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में इस परीक्षा में बैठने वालों में से औसतन 15 से 25 प्रतिशत ही उत्तीर्ण हो पाए हैं। हर साल 40 से 50 हजार अभ्यर्थी बैठते हैं और उनमें से अधिकतर खाली हाथ लौटते हैं। इसके पीछे कई कारण गिनाए जाते हैं। रूस, यूक्रेन, चीन, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे देशों में सस्ती फीस के लालच में दाखिला लेने वाले कई छात्रों को वहाँ की पढ़ाई और भारतीय परीक्षा के स्तर में बड़ा अंतर मिलता है। भाषा की दिक्कत, प्रैक्टिकल प्रशिक्षण की कमी और कोविड के दौर में ऑनलाइन पढ़ाई ने हालत और बिगाड़ी। भारत में एक सरकारी सीट के लिए 20 लाख से ज्यादा परीक्षार्थी NEET में बैठते हैं और निजी कॉलेजों की फीस करोड़ तक पहुँच जाती है। ऐसे में कई परिवार कर्ज लेकर बच्चों को विदेश भेजते हैं। जब डिग्री के बाद भी लाइसेंस नहीं मिलता, तो निराशा और सामाजिक दबाव कुछ लोगों को गलत रास्ते की ओर धकेल देता है। यह पृष्ठभूमि अपराध को सही नहीं ठहराती, लेकिन समस्या की जड़ समझने में मदद करती है।

असल सवाल यह है कि फर्जी दस्तावेज पंजीकरण तक पहुँचे कैसे। आरोप के मुताबिक जाली डिग्री और अंकतालिका के आधार पर राजस्थान मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण हो गया और गड़बड़ी तब पकड़ी गई जब संस्थानों से सत्यापन कराया गया। मतलब सत्यापन की प्रक्रिया हुई जरूर, पर पंजीकरण के बाद। नियम से यह जाँच पंजीकरण से पहले होनी चाहिए थी। देश में पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या अब 13 लाख से ऊपर बताई जाती है और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर बनाने की दिशा में काम शुरू किया है। इसके तहत हर डॉक्टर को विशिष्ट पहचान संख्या मिलनी है, ताकि कोई भी व्यक्ति उसकी डिग्री और पंजीकरण की स्थिति जाँच सके। लेकिन जब तक राज्यों की काउंसिलें विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से सीधे डिजिटल सत्यापन नहीं करतीं, तब तक कागज की जालसाजी पर रोक लगाना मुश्किल रहेगा। छपी हुई मोहर और अंकतालिका आज इतनी आसानी से नकल हो जाती है कि केवल दस्तावेज देखकर भरोसा करना भूल है। सत्यापन सीधे जारी करने वाले संस्थान से, ऑनलाइन और पंजीकरण से पहले होना जरूरी है।

इस पूरे मामले का सबसे डरावना पहलू मरीज की जान से जुड़ा है। गायनेकोलॉजी जैसे क्षेत्र में एक गलत फैसला माँ और नवजात दोनों की जिंदगी छीन सकता है। राजस्थान की करीब 8 करोड़ आबादी का बड़ा हिस्सा गाँवों में रहता है, जहाँ सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के पद बड़ी संख्या में खाली रहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अनुसार प्रति 1000 आबादी पर 1 डॉक्टर होना चाहिए। सरकारी दावों में देश का औसत इस मानक के आसपास बताया जाता है, पर शहर और गाँव के बीच की खाई गहरी है। जहाँ असली डॉक्टर नहीं पहुँचते, वहाँ झोलाछाप और फर्जी डिग्रीधारी अपनी दुकान जमा लेते हैं। गाँव का गरीब मरीज डिग्री की जाँच नहीं करता, वह सफेद कोट और क्लीनिक के बोर्ड पर भरोसा करता है। यही भरोसा इस कारोबार की पूँजी है। जब इलाज गलत होता है, तो अक्सर मामला पीड़ित परिवार की चुप्पी में दब जाता है, क्योंकि न उनके पास कानूनी लड़ाई के संसाधन होते हैं, न जानकारी।

एसओजी की कार्रवाई सराहनीय है, पर केवल गिरफ्तारी से समाधान नहीं निकलेगा। जरूरी है कि राजस्थान में पंजीकृत सभी डॉक्टरों के दस्तावेजों की चरणबद्ध पुनः जाँच हो, खासकर उनकी जिन्होंने विदेश से डिग्री ली है या जिनके पास केवल डिप्लोमा है। पंजीकरण के हर आवेदन का विश्वविद्यालय या बोर्ड से सीधा डिजिटल सत्यापन अनिवार्य हो और बिना उसके प्रमाणपत्र जारी न किया जाए। अस्पतालों और क्लीनिकों के बाहर डॉक्टर का पंजीकरण नंबर लिखना जरूरी किया जाए, ताकि मरीज उसे ऑनलाइन जाँच सके। जिन अधिकारियों की लापरवाही से जाली कागज पंजीकरण तक पहुँचे, उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। साथ ही विदेश में मेडिकल पढ़ाई का सपना दिखाने वाले एजेंटों और परामर्श केंद्रों पर निगरानी बढ़ाई जाए, ताकि छात्र और अभिभावक गुमराह न हों। चिकित्सा पेशे की गरिमा इसी में है कि सफेद कोट पहनने वाले हर व्यक्ति पर मरीज आँख मूँदकर भरोसा कर सके। यह भरोसा एक बार टूटता है तो ईमानदार डॉक्टरों की साख भी दाँव पर लगती है। इसलिए इस प्रकरण को चंद लोगों की धोखाधड़ी मानकर भुला देना भूल होगी। यह चेतावनी है कि व्यवस्था की जाँच पंजीकरण से पहले हो, बाद में नहीं। (यह लेखक के निजी विचार है।)

Devendraraj Suthar Verified Local Voice • 25 Aug, 2026 Editor

स्वतंत्र लेखक

Digital Archives

Recommended Posts

home Home amp_stories Web Stories local_fire_department Trending play_circle Videos mark_email_unread Newsletter