कुर्सी एक, दावे अनेक
गाँव का नक्शा चाहे जितना छोटा हो, सरपंच के चुनाव की घोषणा होते ही वह विश्व राजनीति की धुरी बन जाता है। लोकतंत्र जब राजधानी की सड़कों से उतरकर कच्चे रास्तों और बरगद की छाँव तक पहुँचता है, तो उसकी महिमा दोगुनी हो जाती है। आम चुनाव तो महज सरकारें बदलते हैं, पर सरपंच का चुनाव सीधे-सीधे रिश्तेदारियाँ, पुराना उधार और पीढ़ीगत दुश्मनी तय करता है। लोकतंत्र का असली अमृत इसी निचले स्तर पर पूरी मिठास के साथ उबकाई मारता है।
सरपंची की उम्मीदवारी की पहली शर्त योग्यता नहीं, बल्कि हर द्वार पर बिना किसी काम के घंटों बैठने का धैर्य है। जो आदमी कल तक राम-राम का जवाब तक नहीं देता था, वह अचानक चौपाल पर हर बुजुर्ग के पैर छूने में ऐसा हुनर दिखाता है मानो उसके कटिबंधीय जोड़ इसी एक काम के लिए बने हों। प्रत्याशी का चेहरा ऐसा मासूम हो जाता है जैसे उसने जीवन में कभी मच्छर तक न मारा हो। चुनाव से दस दिन पहले गाँव में प्रेम का ऐसा ज्वार आता है कि लगता है पूरी बस्ती एक ही परिवार है। हर नल पर पानी भरने की जगह नहीं, बल्कि देश और गाँव के उद्धार की रणनीतियाँ बनती हैं।
सरपंच के चुनाव का सबसे सुंदर पहलू उसका चुनाव-चिह्न होता है। किसी को 'कढ़ाई' मिलती है तो किसी को 'चश्मा', तो कोई 'चारपाई' लेकर मैदान में उतरता है। विचारों और नीतियों की कमी को ये चुनाव-चिह्न बखूबी पूरा करते हैं। कोई प्रत्याशी गाँव के विकास की बात नहीं करता, वह सीधे कहता है कि अगर आपने 'बाल्टी' पर बटन दबाया तो गाँव में विकास की नदियाँ बह निकलेंगी। अब बाल्टी और विकास का क्या संबंध है, यह सिर्फ भारत का सर्वशक्तिमान मतदाता ही समझ सकता है।
गाँव की रातें इस दौरान अत्यंत धर्मनिरपेक्ष और उदार हो जाती हैं। दिन में जो प्रत्याशी चरित्र-निर्माण पर भाषण देता है, रात के अँधेरे में उसकी गाड़ियों से चाय, बिस्कुट और 'विशेष तरल' सामग्री का वितरण होता है। लोकतंत्र का यह वही पवित्र चरण है जहाँ मतदाता अचानक अपने अमूल्य वोट की असली कीमत समझता है। कल तक जो किसान अपनी फसल की कीमत के लिए तरसता था, वह आज एक बोतल और एकाध गमछे के बदले अपने पूरे खानदान की निष्ठा बेच आता है। इसे ही भारतीय लोकतंत्र की व्यावहारिक परिपक्वता कहा जाता है।
गाँव के चुनाव में घोषणापत्र कोई लिखित दस्तावेज नहीं होता, बल्कि एक अमर लोककथा होता है। हर प्रत्याशी का दावा होता है कि जीतने के बाद गाँव को सीधा पेरिस से जोड़ दिया जाएगा। जो नाली पिछले पचास सालों से बही नहीं, उसे ऐसा दुरुस्त किया जाएगा कि उसमें गंगाजल बहने लगेगा। सब जानते हैं कि चुनाव बीतते ही यह सारा विकास फाइल से निकलकर वापस प्रत्याशी की जेब में चला जाएगा, फिर भी सुनने में बड़ा सुख मिलता है। आखिर झूठे सपनों की कोई कीमत तो चुकानी नहीं पड़ती।
और सबसे अंत में आता है मतदान का दिन। इस दिन गाँव की शांति देखने लायक होती है, ठीक वैसी ही शांति जैसी किसी बम के फटने से ठीक पहले होती है। हर कोई मुस्कुरा रहा होता है, पर आँखें बता रही होती हैं कि रात को किसकी चौपाल पर कितनी रसद पहुँची थी। नतीजे आते ही जो हारता है, वह तुरंत ईवीएम या प्रशासन की धांधली को कोसने लगता है और जो जीतता है, वह तुरंत अपने विरोधी के घर के आगे ढोल बजवाकर गाँव की शांति और भाईचारे की बहाली का ऐलान करता है।
पाँच साल बाद जब यही सरपंच गाँव की सड़कों पर खड्डे और नालियों में कचरा छोड़कर अपनी नई चारपहिया गाड़ी से गुजरता है, तब मतदाता मंद-मंद मुस्कुराता है। उसे मलाल नहीं होता, क्योंकि उसे पता है कि चार साल बाद फिर चुनाव आएँगे, फिर मुफ़्त की चाय छनेगी, फिर कोई उसके पैर छुएगा और लोकतंत्र फिर से अपनी पूरी रंगत में किसी बरगद के नीचे बीड़ी सुलगाता हुआ मुस्कुराएगा।