कृषि भूमि से प्रस्तावित बाईपास पर ग्रामीणों का विरोध, मुख्यमंत्री व सार्वजनिक निर्माण मंत्री के नाम सौंपा ज्ञापन
जालोर. सांचौर-रानीवाड़ा -आबूरोड सड़क मार्ग पर स्थित ग्राम बड़गांव में प्रस्तावित बाईपास को लेकर कुछ ग्रामीणों और किसानों में नाराजगी है। किसानों ने जिला कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री तथा सार्वजनिक निर्माण मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर प्रस्तावित बाईपास को निरस्त करने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रस्तावित बाईपास बड़गांव, पीथापुरा और जैतपुरा की उपजाऊ कृषि भूमि से होकर गुजर रहा है, जिससे किसानों की आजीविका और पर्यावरण दोनों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो जाएगा। प्राकृतिक हरियाली और कृषि समृद्धि के कारण क्षेत्र को "जालौर का कश्मीर" कहा जाता है। यहां के अधिकांश परिवारों की आजीविका पूरी तरह कृषि पर निर्भर है।

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किसानों के अनुसार प्रस्तावित बाईपास निर्माण से कई किसानों की दो से तीन बीघा उपजाऊ भूमि अधिग्रहित हो जाएगी, जहां वर्तमान में सब्जियों सहित विभिन्न फसलों का उत्पादन किया जाता है। इससे प्रभावित परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा होने की आशंका है। ग्रामीणों का कहना है कि भूमि उनके जीवनयापन का मुख्य साधन है और इसके प्रभावित होने से उनकी आय पर सीधा असर पड़ेगा।
ग्रामीणों ने यह भी आशंका जताई कि बाईपास से गुजरने वाले भारी वाहनों से निकलने वाला धुआं, धूल और प्रदूषण कृषि उत्पादन को प्रभावित करेगा। इसके अलावा प्रस्तावित बाईपास के निर्माण के लिए हजारों हरे-भरे पेड़-पौधों की कटाई करनी पड़ेगी, जिससे क्षेत्र के पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन को भारी नुकसान पहुंचेगा।
ग्रामीणों ने बताया कि वर्तमान में बड़गांव से होकर लगभग 30 मीटर चौड़ा फोरलेन मार्ग पहले से उपलब्ध है तथा पुराने स्टेट हाईवे के दोनों ओर पर्याप्त भूमि भी छोड़ी गई है। उनका तर्क है कि मौजूदा मार्ग पर यातायात का दबाव अपेक्षाकृत कम है, इसलिए बड़गांव में नए बाईपास की आवश्यकता नहीं है। केवल आधा किलोमीटर के मौजूदा मार्ग के स्थान पर लगभग पांच किलोमीटर लंबा बाईपास बनाना अनावश्यक और अव्यवहारिक निर्णय है।
ग्रामीणों ने ज्ञापन में मांग की है कि किसानों की उपजाऊ भूमि, पर्यावरण और जनहित को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावित बाईपास योजना को तत्काल निरस्त किया जाए तथा वर्तमान सड़क मार्ग का ही आवश्यकतानुसार नवीनीकरण और विकास किया जाए। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो वे लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे।