11 वोट तो परिवार के थे! 21 लाख फॉलोअर्स वाले 'एस्ट्रो-ब्लॉगर' की कुंडली गांव वालों ने 33 वोटों में लिख दी
- "मुझे तो अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था, मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था... और सुन लो, जितनी चर्चा तुम्हारी जीत को लेकर नहीं है, उससे कहीं ज्यादा चर्चा तो मेरी हार को लेकर है!"
डिजिटल स्पेस में जिसे 'भगवान' मान लिया गया था, लोकतंत्र की जमीनी चौपाल ने उसे एक ही झटके में फर्श पर ला पटका। राजस्थान के जोधपुर जिले की ओसियां तहसील के एक गुमनाम से गांव 'इंदों की ढाणी' में जब पंचायत चुनाव के नतीजे आए, तो वह सिर्फ एक सरपंच पद का परिणाम नहीं था। वह सोशल मीडिया के उस झूठे अहंकार पर करारा तमाचा था, जो स्क्रीन के लाइक्स को अपना परमानेंट वोट बैंक समझ बैठा था। इंटरनेट की दुनिया में 21 लाख (2.1 मिलियन) से ज्यादा फॉलोअर्स की फौज रखने वाले एस्ट्रो-ब्लॉगर ओमप्रकाश बिश्नोई को जब अपने ही गांव के कुल 1600 मतदाताओं में से महज 33 वोट मिले, तो डिजिटल लोकप्रियता का पूरा का पूरा साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया। यह हार सिर्फ एक प्रत्याशी की शिकस्त नहीं है। यह तकनीक के दौर में जी रही उस पीढ़ी के लिए एक आंखें खोल देने वाला पॉलिटिकल थ्रिलर है, जो यह मानती है कि रील पर व्यूज बटोरना और जनता का दिल जीतना एक ही बात है।
वर्चुअल रीच बनाम विलेज रियलिटी: स्क्रीन का भ्रम और जमीन का सच
आज का युवा सोशल मीडिया के एल्गोरिदम को ही अपनी किस्मत का विधाता मानने लगा है। ओमप्रकाश बिश्नोई के इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर लाखों फैंस हैं, जो उनकी हर एक बात पर 'हार्ट' और 'थंब' वाले इमोजी की बौछार कर देते हैं। इसी आभासी दुनिया के ग्लैमर ने शायद ओमप्रकाश को यह भ्रम दिया कि जिस जनता को वे स्क्रीन पर उंगलियों से नचा रहे हैं, वही उंगलियां पोलिंग बूथ के भीतर ईवीएम (EVM) का बटन दबाकर उन्हें गांव का मुखिया चुन लेंगी। लेकिन भारतीय लोकतंत्र का मिजाज आज भी बहुत देसी और जिद्दी है। ग्रामीण राजनीति 'ग्लोबल नेटवर्क' से नहीं, बल्कि 'लोकल नेबरहुड' (पड़ोस) के भरोसे से चलती है। ओमप्रकाश के 21 लाख फॉलोअर्स में से बहुसंख्यक लोग शायद दुनिया के अलग-अलग कोनों में बैठे थे, जो उनके वीडियो पर कमेंट तो कर सकते थे, लेकिन ओसियां के उस धूल भरे पोलिंग बूथ पर आकर पर्ची नहीं कटा सकते थे। सोशल मीडिया आपको मशहूर कर सकता है, लेकिन वह किसी ग्रामीण के सुख-दुख का साथी नहीं बन सकता।
'दीये तले अंधेरा' या मनोरंजन और नेतृत्व के बीच का फर्क?
हार के बाद खुद ओमप्रकाश ने भर्राई आवाज में कहा कि यह "दीये तले अंधेरा" है, क्योंकि पूरी दुनिया उन्हें सुनती है पर उनके अपने गांव ने उन्हें नकार दिया। लेकिन इस हार के पीछे का एंगल यह है कि भारत का आम मतदाता आज भी सोशल मीडिया को मनोरंजन का साधन समझता है, नेतृत्व की योग्यता का सर्टिफिकेट नहीं। गांव के किसी बुजुर्ग या महिला के लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि आपके वीडियो को कितने मिलियन लोगों ने देखा।
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उनके लिए मायने यह रखता है कि जब आधी रात को पानी की पाइपलाइन फटेगी, जब अस्पताल में बेड नहीं मिलेगा, या जब थाने में कोई सुनवाई नहीं होगी, तब क्या यह सोशल मीडिया का 'किंग' उनके साथ खड़ा होगा? ग्रामीणों को रील बनाने वाला कोई वीआईपी स्टार नहीं चाहिए, उन्हें चौपाल पर बैठकर उनकी आधी अधूरी बात सुनने वाला एक साधारण इंसान चाहिए, जो चौबीस घंटे उपलब्ध रहे।
आदर्शवाद का ढोंग या मतदाताओं का खामोश तमाचा?
सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर छाती पीटी जा रही है कि ओमप्रकाश के साथ धोखा हुआ। ओमप्रकाश का दावा है कि उन्होंने नशा मुक्ति, शिक्षा और गौ-सेवा जैसे ऊंचे मुद्दों पर चुनाव लड़ा और पारंपरिक तौर पर बांटी जाने वाली शराब या पैसे का सहारा नहीं लिया। पहली नजर में यह कदम बहुत क्रांतिकारी और साफ-सुथरा लगता है। परंतु, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि ग्रामीण राजनीति की जड़ें बेहद पेचीदा होती हैं। वहां सदियों पुराने पारिवारिक संबंध, जातिगत समीकरण, आपसी भाईचारा और पिछले बरसों में किए गए जमीनी काम ही वोट तय करते हैं। ओमप्रकाश की आदर्शवादी बातें किसी वातानुकूलित स्टूडियो में या मोबाइल की स्क्रीन पर तो खूब तालियां बटोर सकती हैं, लेकिन जमीन पर बिना पसीना बहाए, बिना लोगों के घर-घर जाकर हाथ जोड़े, सिर्फ डिजिटल रसूख के दम पर सत्ता हथियाने की कोशिश को जनता ने अपना अपमान समझा और मौन रहकर एक ऐसा तमाचा जड़ा जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है।
आखिरी सबक: अंगूठे का निशान कभी ईवीएम का बटन नहीं होता
ओमप्रकाश बिश्नोई के खाते में आए 33 वोटों में से 11 वोट उनके सगे परिवार के थे। यानी पूरे गांव में से सिर्फ 22 बाहरी लोगों ने उन पर भरोसा जताया। यह आंकड़ा चीख-चीखकर कह रहा है कि भविष्य में जो भी कंटेंट क्रिएटर या इन्फ्लुएंसर अपने डिजिटल साम्राज्य को राजनीतिक ताकत में बदलने का ख्वाब देख रहे हैं, वे इस हकीकत को नोट कर लें। 21 लाख फॉलोअर्स बनाम 33 वोटों की यह दास्तान आने वाले कई सालों तक केस स्टडी की तरह पढ़ी जाएगी। यह इस बात का जिंदा सुबूत है कि चाहे भारत कितना भी डिजिटल हो जाए, जब बात लोकतंत्र के सबसे जमीनी स्तर यानी पंचायत की आएगी, तो जनता केवल उसी के सिर पर ताज सजाएगी जिसकी जड़ें मिट्टी से जुड़ी हों, न कि वाई-फाई के सिग्नल से।