संत डूंगानाथ वार्षिक मेले में आदिवासी क्रांतिकारी पर लिखी ऐतिहासिक पुस्तक का विमोचन

संत डूंगानाथ वार्षिक मेले में आदिवासी क्रांतिकारी पर लिखी ऐतिहासिक पुस्तक का विमोचन

जालोर. मीणा समाज के आराध्य संत डुंगानाथ महाराज के वार्षिक मेला महोत्सव के अवसर पर ग्राम पावा ( पाली) में आदिवासी इतिहास और स्वतंत्रता-पूर्व क्रांतिकारी परंपरा से जुड़ी ऐतिहासिक पुस्तक का विमोचन किया गया। यह पुस्तक मारवाड़ क्षेत्र के आदिवासी जननायक एवं स्वतंत्रता-पूर्व क्रांतिकारी पदा मीणा के जीवन, संघर्ष, शौर्य और बलिदान पर आधारित है।

पुस्तक का विमोचन मीणा समाज के सक्रिय साथी जोराराम मीणा सेदरिया (जालोर) द्वारा किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि पुस्तक पदा मीणा को अंग्रेज़ी शासन और सामंती अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष करने वाले आदिवासी जननायक और शोषितों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है।

विज्ञापन

आदिवासी महासभा जालोर अध्यक्ष रूपाराम मीणा ने बताया कि पदा मीणा का जन्म 1836 ई. में भाद्राजून (जिला जालोर) में हुआ था। 19वीं शताब्दी में उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत और सामंती शोषण के विरुद्ध सशक्त जनसंघर्ष का नेतृत्व किया। अगस्त 1887 में गिरफ्तारी के बाद 5 नवम्बर 1887 को जोधपुर में उन्हें फांसी दी गई। उन्होंने कहा कि पदा मीणा का बलिदान आदिवासी प्रतिरोध आंदोलनों का महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसे अब इतिहास के हाशिये से मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। यह पुस्तक 19वीं शताब्दी के उस दौर की तस्वीर पेश करती है, जब अंग्रेज़ी हुकूमत और स्थानीय सामंती व्यवस्था के खिलाफ आदिवासी समाज में गहरा असंतोष पनप रहा था।

विज्ञापन

पुस्तक के लेखक शुभाषचंद्र कुशवाहा ने ऐतिहासिक दस्तावेजों, जनश्रुतियों और समकालीन संदर्भों के आधार पर यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि पदा मीणा को लंबे समय तक ‘डकैत’ कहकर इतिहास में गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि वे शोषित-वंचित वर्गों के रक्षक और जननायक थे। वे अत्याचारियों और शोषकों से छीनी गई संपत्ति गरीबों और जरूरतमंदों में बाँटते थे, इसी कारण जनता ने उन्हें स्नेहपूर्वक “मारवाड़ का रॉबिनहुड” कहा।

जीवन, संघर्ष और बलिदान

पुस्तक में बताया गया है कि पदा मीणा का जन्म 1836 ई. में भाद्राजून (जिला जालोर) में मीणा जनजाति के एक सामान्य परिवार में हुआ। 19वीं शताब्दी में उन्होंने अंग्रेज़ी शासन और स्थानीय सामंतों के अत्याचारों के खिलाफ सशस्त्र जनसंघर्ष का नेतृत्व किया। यह संघर्ष केवल सत्ता विरोध नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, स्वाभिमान और बराबरी के अधिकारों की लड़ाई था। इतिहासकारों का मानना है कि यह बलिदान उस दौर के आदिवासी प्रतिरोध आंदोलनों का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया।

इतिहास को नई दृष्टि

इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पुस्तक न केवल आदिवासी इतिहास को नई दृष्टि देती है, बल्कि स्वतंत्रता-पूर्व जनआंदोलनों को समझने में भी मददगार है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि कैसे औपनिवेशिक और सामंती सोच ने जननायकों को अपराधी बताकर उनकी छवि धूमिल की।

पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग

आदिवासी महासभा, जालोर सहित कई आदिवासी सामाजिक संगठनों ने इस पुस्तक को राजस्थान अध्ययन और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल करने की मांग उठाई है। संगठनों का कहना है कि ऐसी पुस्तकों से नई पीढ़ी को अपने वास्तविक आदिवासी नायकों को पहचानने का अवसर मिलेगा।

विज्ञापन

आदिवासी महासभा अध्यक्ष रूपाराम मीणा ने कहा कि ‘मारवाड़ के डकैत और रॉबिनहुड पदा मीणा’ इतिहास के उन दबे हुए पन्नों को उजागर करती है, जिन्हें अब तक हाशिये पर रखा गया। यह कृति एक आदिवासी जननायक को उसका उचित सम्मान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।