विद्वानों और कलाकारों के महान संरक्षक व संस्कृत के ज्ञानी थे राजा भोज - अर्जुनसिंह

विद्वानों और कलाकारों के महान संरक्षक व संस्कृत के ज्ञानी थे राजा भोज - अर्जुनसिंह
  • ज्ञान, न्याय और लोक कल्याण के प्रेरक उदाहरण थे राजा भोज-देलदरी

जालोर।  भारत में एक ऐसा चरित्र हुआ जिसने ज्ञान कला व साम्रज्य विस्तार कर एक ऐसी शासन व्यवस्था कायम की जिससे देश में सुशासन व ज्ञान की गंगा बहने लगी और विद्वानों के आश्रयदाता बने थे। राजा भोज भारतीय इतिहास के ऐसे महान शासक थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता, वीरता और न्यायप्रिय शासन से अमिट छाप छोड़ी। वे परमार वंश के प्रतापी राजा थे और 11वीं शताब्दी में मालवा क्षेत्र पर शासन करते थे।

यह बात आज श्री आपेश्वर गोशाला देलदरी में बसंत पंचमी पर राजा भोज परमार व सरस्वती की जयंती पर श्री क्षत्रिय युवक संघ के संभाग प्रमुख अर्जुनसिंह देलदरी ने कही। उन्होंने कहा कि उनकी राजधानी धार थी, जिसे उन्होंने शिक्षा, साहित्य और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बना दिया। राजा भोज का नाम आते ही एक ऐसे आदर्श राजा की छवि उभरती है, जो तलवार और कलम—दोनों में समान रूप से निपुण था।

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राजा भोज न केवल एक शक्तिशाली शासक थे, बल्कि उच्च कोटि के विद्वान, दार्शनिक और लेखक भी थे। उन्हें संस्कृत भाषा का गहन ज्ञान था। राजा भोज विद्वानों और कलाकारों के महान संरक्षक थे। उनके दरबार में देश-विदेश से विद्वान आते थे और उन्हें सम्मान, आश्रय तथा स्वतंत्रता प्राप्त होती थी। उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए विद्यालयों, मठों और मंदिरों की स्थापना करवाई। कहा जाता है कि भोजपुर में निर्मित विशाल शिव मंदिर व जालोर का संस्कृत विद्यालय जो वर्तमान में तोपखाना के नाम से जाना जाता है उनकी स्थापत्य रुचि का उत्कृष्ट उदाहरण है।

प्रशासन के क्षेत्र में राजा भोज को एक न्यायप्रिय और लोककल्याणकारी शासक माना जाता है। वे प्रजा की समस्याओं को स्वयं सुनते थे और न्याय करने में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं करते थे। राजा भोज की ख्याति केवल उनके समय तक सीमित नहीं रही। लोककथाओं और साहित्य में उन्हें “राजा भोज और गंगू तेली” जैसे कथाओं के माध्यम से एक न्यायपूर्ण और बुद्धिमान राजा के रूप में याद किया जाता है। वे भारतीय परंपरा में आदर्श राजा के प्रतीक बन गए।

इस प्रकार राजा भोज एक ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने शौर्य, ज्ञान और संस्कृति का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया। भारतीय इतिहास में उनका स्थान सदैव एक विद्वान-राजा और संस्कृति के अमर संरक्षक के रूप में बना रहेगा।  कार्यक्रम को मंशाराम प्रजापत,नेपाल सिंह दुदवा, भक्त मोहनजी ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर शैतान सिंह, ईश्वर सिंह, पुरण सिंह,मलसिंह,महेंद्रसिंह खेतसिंह, इंद्र सिंह,दलपत सिंह, जगदीश सुथार प्रताप राजपुरोहित देशराम,मीना राम मेघवाल एवम गाँव के सभी जाति के लोगो की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ।

 तनसिंह जयंती समारोह देलदरी में होगा आयोजित

 देलदरी में तन सिंह की जयंती संघ के जालोर प्रान्त की जयंती गाँव मे श्री सिरोसी माता मंदिर प्रांगण में 25 जनवरी रविवार को मनाई जाएगी। जिसमे जालोर आहोर व रामसीन के आस-पास गांवों से समाज के बालक/बालिकाओं सहित समाज बंधु सम्मिलित होंगे।